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Ache Dekhane !!

by Raghuram

Posted on December 15, 2015 at 10:30 AM

देवराज ट्रक टर्मिनल , यशवंतपुर , बेंगलुरु l जैसा नाम वैसा धाम l गाड़ियां ही गाड़ियां और गाड़ियों के नाम पर तरह-तरह की लॉरियां l आने से पहले इस जगह की मैंने कुछ तस्वीरें मात्र ही देखी थी l तस्वीरों में टर्मिनल काफी साफ सुथरा और सुगठित लग रहा था l वास्तव में जब मैंने यहां पर कदम रखे तो लगा तस्वीरें भी झूठ बोलती हैं l सबकुछ तितर-बितर l गाड़ियां ऐसी खड़ी थीं मानो फ्लैश स्ट्राइक का नोटिस दिया गया हो l गंदे और दयनीय परिस्थितियों में थे सारे के सारे रास्ते l बिल्डिंग भी मनमाने ढंग से बनी हुई थीं l तरह तरह के मकान और हर मकान में कई दुकान l दुकानों पर अलग-अलग साइन बोर्ड l छोटे बड़े सभी ट्रांसपोर्टर के नाम l भारत के अस्त-व्यस्त परिवहन जगत का जीता जागता उदाहरण है यह ट्रक टर्मिनल l इन सबके बीच से गुजरता हुआ मैं पहुंच गया के .जी .टी .ए . भवन l इसी ट्रक टर्मिनल के बीचों बीच स्थित इस भवन में है ट्रांसपोर्ट मित्र का चालक विकास केंद्र l इस केंद्र में ट्रांसपोर्ट मित्र और सहयोगी संस्था पिक्सेल हेल्थ के सारे कर्मचारी उमंग और उत्साह से भरे नई पीढ़ी के नौजवान हैं l कुछ कर दिखाने की इच्छा उनकी आंखों में साफ झलक रही थी l यहां ड्राइवरों को 'स्मार्ट ड्राइवर प्रेाग्राम ' का प्रशिक्षण मिलता है और साथ ही स्वास्थ्य जांच और योग के व्यावहारिक पाठ

भी l अन्य प्रशिक्षण स्कूलों की तरह यहां ड्राइवर निर्धारित समय पर अपने आप नहीं चले आते हैं l हमारे ये ट्रांसपोर्ट मित्र के नौजवान मित्र घर घर क्षमा कीजिए ट्रक ट्रक जाकर उन्हें बुला लाते हैं l यहां घोड़ा तालाब के पास नहीं जाता बल्कि तालाब को घोड़े तक लाया जाता है l भविष्य बताएगा इन घोडों में पानी पीने की लालसा है या नहीं l टांसपोर्टमित्र का एक नया प्रयोग ! उनका उद्देश्य साफ है l इन राजमार्ग के चालकों में एक क्रांतिकारी परिवर्तन लाया जाए l क्रांतिकारी परिवर्तन के लिए आवश्यक है इक क्रांतिकारी सोच की l लकीर से कुछ अलग हटकर करने का इनका दृढ़ निश्चय l ट्रांसपोर्ट मित्र का मानना है कि कहीं दूर दराज इलाके में अगर चालक विकास केंद्र बनाए भी जाएं तो वह सिर्फ खानापूर्ति मात्र ही होगी l आज आवश्यकता है कि इन प्रशिक्षण केंद्रों को उस जगह ले जाने की जहां हमारे ड्रायवर साथी सहज रुप से आते-जाते रहते हैं l अब वह चाहे हाईवे का ढाबा हो ,फेक्टरी गेट हो , या फिर ट्रक टर्मिनल l यही कारण है कि बेंगलुरु का चालक विकास केंद्र देवराज ट्रक टर्मिनल में स्थित है l इसी kgta बिल्डिंग के तीसरे मंजिल पर पहुंचे हम सीढ़ियां नापते हुए - हाँफते हुए l लिफ्ट नहीं

है l शायद हमारे स्वास्थ्य की उन्हें चिंता है और इसीलिए तो बिना पैसे मोटापा कम करने का मौका दे रहे हैं l

वैसे हर किसी प्रशिक्षण केंद्र में समय बंधा होता है l प्रशिक्षणार्थी पहले पहुंचकर कक्षा में बैठते हैं और फिर आते हैं प्रशिक्षक महोदय l लेकिन यहां तो उल्टी गंगा बहती दिख रही है l

करीब एक घंटे के बाद अचानक सीढ़ियां चढ़ते और आपस में गप्पे लगाते हुए पहुंचा ड्राइवरों का एक दल l पैंट शर्ट लुंगी बनियान और तरह-तरह के परिधान l किसी की दाढ़ी बढ़ी हुई थी तो किसी के बाल बिखरे हुए थे l 'अंगवस्त्र' जैसा कि दक्षिण भारत में कहते हैं , के नाम पर गमछे पड़े थे कुछ एक के कंधों पर l यही कोई 15 चालकों का होगा यह दल l हमारे नौजवान मित्रों ने उनका स्वागत किया और आग्रह पूर्वक उन्हें बिठाया l किसान को अपने लहलहाते खेत देखकर जो प्रसन्नता होती है वही प्रसन्नता मुझे अपने ट्रांसपोर्टमित़्र साथियों के चेहरों पर दिखी इन ड्राइवरों को देखकर l अपने ड्राइवर प्रशिक्षणार्थी की आंखों में कुतूहल और शंका एक साथ देखी जा सकती थी l

मैंने मुस्कुराते हुए पहल की ,"आप सब कौन सी भाषा समझते हैं ?" एक स्वर में जवाब मिला ,'तमिल ' "हम सब बाल मुरगन ट्रांसपोर्ट से आए हैं " l मैंने एक बात अच्छी तरह सीख ली है कि किसी व्यक्ति से आसान - सा रिश्ता जुड़ जाता है उसकी मातृभाषा के माध्यम से l मैंने 18 साल चेन्नई रहने के अपने अनुभव को काम में लाते हुए उनकी ही मातृभाषा में कहा, 'वणक्कम ' l जादू चल गया ! एक स्वर में गरम जोशी से जवाब मिला , ' वणक्कम 'l मैंने कहा, "दोस्तों मुझे अच्छे तमिल का ज्ञान नहीं है , हाँ अगर आपकी समझ में मेरी टूटी फूटी तमिल आ जाए तो हम इसी भाषा में आज विचारों का आदान प्रदान करेंगे " l

प्रस्ताव सर्वसम्मति से पास हो गया !

हमारी वेषभूषा ही हमारी पहली पहचान होती है l आज सीखने और सिखाने के पहले सत्र का अहम मुद्दा यही था l

वेलायुदम इन्ही चालकों में से एक ऐसा व्यक्ति था जिसे अपने रख- रखाव और पहनावे से कोई मतलब नहीं था l बिखरे बाल , बढी हुई दाढ़ी , लुंगी और ऊपर से मैला सा मुडा-तुडा टीशर्ट l उसकी उमर होगी यही कोई 35 वर्ष के आसपास l मैंने ठान ली कि इनके ग्रूमिंग की बात इन्हीके घरेलू वातावरण से क्यों ना की जाए l

वेलू से मुखातिब होकर मैंने पूछा ,"क्या आपके बच्चे स्कूल जाते हैं " ?

उसने सिर्फ सिर हिलाकर हां कही l

"अपने बच्चे के साथ कभी उसके स्कूल जाने का मौका मिला है "?

"जी, विद्यालय के वार्षिकोत्सव पर ' उसका जवाब था l

"इसी वेशभूषा में", मैंने मुस्कुराते हुए पूछा l

जोर से हंस पड़ा वेलू और उसके सारे साथी भी उस हंसी में शामिल हो गए l लगता था यह आप - बीती सबकी है l

वेलू ने जवाब में बताया ," साहब मैं इस तरह जाने की तो सोच भी नहीं सकता l दूसरों की बात छोड़िए सबसे पहले मेरी 10 साल की बिटिया लक्ष्मी खुद ही मुझे डांट लगाएगी l नाराज होकर कहेगी अप्पा आप मेरे साथ ऐसा मत आइए क्या समझेंगे मेरे साथी और मेरे

शिक्षक l उसके भाषण के शुरू होते ही मैं झट सजने सवरने ,ढंग के कपड़े पहनने में लग जाता हूं l उसके साथ स्कूल जो जाना है मुझे” l "सच साहब , मेरी छोटी सी लक्ष्मी मुझे ऊपर से नीचे तक देख कर मुस्कुराई और लिपट गई मेरे गले से l कहने लगी की अप्पा अब आप कितने अच्छे लग रहे हो l

इनको समझाने का मेरा यह काम सरल हो गया चौथी कक्षा में पढ़ रही लक्ष्मी को इस बात का पता है कि हमारी पहली पहचान , हमारे परिधान से ही होती है l हमारी इज्जत और लोगों का हमारे प्रति अभिप्राय का पहला मापदंड हमारी वेशभूषा और रख-रखाव ही होता है l लक्ष्मी ,जया , मोहन , मुरली के डैडियों , आप लोगों को इसे समझने में क्या कष्ट है ? आपको ड्राइवर से बनना है एक स्मार्ट ड्राइवर l उन्हें मैं समझा रहा था l एक कुशल चालक होना तो हमें है ही , साथ में सामाजिक मर्यादा पाने के लिए और अपने ड्राइवर समुदाय के प्रति बनी गलत धारणाओं को खत्म करने के लिए भी जरूरी है कि आप अच्छा दिखें l अपने रख रखाव और वेशभूषा पर ध्यान दें l कपड़े कीमती नहीं साफ-सुथरे और ढंग के होने चाहिए l टोल बूथ के बाबू से लेकर पुलिसवाले और तो और आपके मालिकों का रवैया भी बदलेगा l साथ में लक्ष्मी बिटिया की प्यार भरी झप्पी बोनस में मिलेगी l भला अच्छा दिखने में बुरा क्या है ?

उनकी एकाग्रता और सहमति वाली शारीरिक-भाषा (बॉडी लैंग्वेज ) से मुझे तसल्ली हो गई कि बात

दिलों तक पहुँच गयी है l

इंतजार है परिवर्तन का l


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