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किस्सा-ए- कनकरास

by Raghuram

Posted on June 13, 2016 at 10:25 AM

ऐयन्कुलतपट्टी तिरुचि जिले का एक छोटा सा गांव है तमिलनाडु में l इस गांव के नाम को बोलने में जितनी परेशानी होती है उससे कहीं अधिक परेशानी इस गांव को मानचित्र में ढूंढने में होती है लेकिन आश्चर्य की बात यह है कि इसी गांव के कुछ नौजवान इस गांव की परिधियों से सैकड़ों मील दूर तक आते-जाते रहते हैं l इसी गांव का एक नौजवान है कनकरासन l उम्र होगी यही कोई 30 के लगभग l काफी बड़े परिवार का बेटा है l बड़े से मेरा मतलब धन-धान्य से नहीं बल्कि संख्या से है l इनके पिता के चार भाई और एक बहन है कनकरासन के चचेरे भाई कई एक वर्षों से हाइवे पर ट्रक चला रहे हैं l ट्र्क चलाने का यह धंधा मालूम नहीं उन्हें किनसे विरासत में मिली लेकिन यह अवश्य मालूम है कि कनकरासन को इसकी दीक्षा मिली अपने ममेरे भाई से l वैसे कनकरासन गांव के विद्यालय में 12 साल बिता दिए लेकिन पड़ा है सिर्फ नवीं कक्षा तक ही l बात दरअसल यह है कि नवी कक्षा से उसे कुछ ज्यादा ही लगाव हो गया था l 3 वर्ष बिता दिए उसने इसी कक्षा में l इस नौजवान की दिलचस्पी क्रिकेट में ज्यादा और पढ़ाई में कम थी विद्यालय को छोड़कर मैदान में डटने की तो ठानी थी लेकिन डट गया राजमार्ग पर अपने भाई के साथ l दो साल तक सहायक का काम बखूबी निभाया और इस गुरुदक्षिणा के एवज में उसे ट्रक चलाना सीखने को मिला l भारत के अधिकांश ट्रक चालकों की तरह यह नौजवान भी किसी ट्रेनिंग सेंटर पर जाकर ट्रक चलाना नहीं सीखा l

Kanakaraj Driver

हो सकता है अपना लाइसेंस बनवाने के लिए आर टी ओ भी न गया हो l मेरा भारत महान ! गांधीजी के छवि के बदले उसे प्राप्त हो गया होगा अपना लाइसेंस l वैसे तो इनके पिता के पास आधा एकड़ जमीन भी है l किसी जमाने में खेत का यह टुकड़ा उपजाऊ हुआ करता था l अब तो बस बंजर भूमि है l इनके पिता भवन निर्माण में मजदूरी करते हैं l परिवार की आर्थिक स्थिति में सुधार लाने के लिए कनकरासन को अपना निर्णय काफी सटीक लगा l उसका मानना है कि यह एक ऐसा धंधा है जिसमें न तो लागत लगती है और ना ही अधिक पढ़ाई की जरूरत होती है l लगे हाथ दूसरों का कल्याण भी हो जाता है देखते ही देखते नौ वर्ष बीत किस्सा-ए- कनकरास गए ट्र्क चलाते हुए l वर्ष 2010 में कनक के मन में इच्छा जगी चालक से मालक बनने की लेकिन व्यावसायिक कुशलता के अभाव में कनक को लेने के देने पड़ गए l ऋण चुका न पाने के कारण कनक को अपनी खरीदी हुई ट्रक बेच देनी पड़ी l घरवालों ने हो हल्ला मचाया l उपदेश मिले कि इस धंधे को छोड़ दे लेकिन कनक अपने हठ पर बना रहा l इस बीच कनकरासन की शादी भी हो गई थी l

उसके दो बच्चे हैं l मित्र आखिरकार मित्र होते हैं बुरे समय में सच्चे मित्रों की परीक्षा अपने आप हो जाती है l कनक का एक मित्र विदेश में काम कर रहा था l उसने स्वेच्छा से 2 लाख रुपये अपने मित्र को लोन दिया आत्माभिमानी कनक 6 महीनों में चिटफंड के जरिए प्राप्त डेढ़ लाख रूपए वापस कर दिए l पहले के कटु अनुभव को याद रखते हुए उस पर एक ही धुन सवार था कि इस ऋण को जल्द से जल्द चुका दिया जाए l अगले छह महीनों का अधिकांश समय ड्राइविंग व्हील के पीछे बैठकर गुजार दिए l इसके फलस्वरुप वह बाकी के रुपए भी चुकाने में समर्थ हो गया l व्यावसायिक सफलता के इस रुप ने कनक के दिल में एक आत्मविश्वास जगा दिया था l अब ट्र्क उसका था l कनक की सफलता को देखकर उसके कुछ अन्य मित्र भी उसके साथ साझेदारी में दूसरा ट्रक खरीद लिया तीसरे ट्रक के आते-आते उनका दस चालकों का गुट हो गया l दो ड्राइवरों का दल मिलकर गाड़ी चलाते थे l दिन में करीब 200 से 250 किलोमीटर प्रति व्यक्ति गाड़ी चलती थी l अगर गाड़ी रुकती थी तो सिर्फ उसकी मरम्मत और यांत्रिक रखरखाव के लिए ही l कनकदासन के भीतर का व्यापारी भली-भांति समझ चुका था कि ट्रक का बेकार खड़ा रहना व्यापार के लिए नुकसानदायक होता है l दो चालकों के वेतन के पश्चात भी उनके पास ₹50000 प्रति ट्रक प्रतिमाह बन जाता था lइसमें ट्रक की मरम्मत ,रखरखाव ,डीजल आदि का खर्च एवम बैंक ऋण का भुगतान भी किया जाता है कनकरासन की सफलता की कहानी बताते हुए हाल में उसके साथ हुई एक दुखद अनुभव को बताना इस कर्मठ नौजवान के दृढ इच्छाशक्ति के खिलाफ होगा l

कनक गुजरात से तिरची तक कोलगेट कंपनी का माल ढो रहा था l उसके साथ किस्सा-ए- कनकरास सह चालक था उसका मित्र शिवा l रास्ते में चलती गाड़ी से हाइवे के अंधकार में चोरों ने लदे माल पर अपना हाथ फिराया इसकी जानकारी जब उसे हुई तो वह पुलिस थाने पहुंचा l पुलिस के दारोगा ने उसे यह कहकर टाल दिया कि वह पुलिस स्टेशन घटनास्थल के दायरे में नहीं आता है और इस कारण उसकी शिकायत दर्ज नहीं की जा सकती है कनकरासन बताए गए दूसरे पुलिस स्टेशन पहुंचा यहां दारोगा जी नहीं थे उनके आने में दो दिन लग गए l वापस आने पर शिकायत दर्ज करना तो दूर उल्टे उस पर तोहमत लगा दिया कि उसने खुद यह जालसाजी रची है lचारों तरफ से निराश कनकरासन ने ट्रांसपोर्ट जगत के कुछ मित्रों कोअपनी परिस्थिति से अवगाह कराया l ऊपर के अधिकारियों के दरवाजे खटखटाने के बाद किसी तरह उसका प्रथम सूचना रिपोर्ट लिखा गया l कुछ दान दक्षिणा का भी प्रबंध किया गया l इस सब में करीब 8-9 दिन लग गए l अपने परिवार को इसकी सूचना दी और उन्होंने अपने गहने गिरवी रखकर कनकरासन को ₹50000 भेजा, बैंक के द्वारा l कनकरासनस के करीब 32000 रूपए खर्च हो गए धन गँवाने के साथ-साथ शारीरिक और मानसिक तनाव का भी शिकार बना अपना नौजवान l इतना सब कुछ होने के बाद भी वह अपने इस धंधे से न तो अलग होना चाहता है और ना ही उसकी परिस्थिति उसे ऐसा करने देगी l अभी तो उसे तीसरे ट्रक का कर्जा जो चुकाना है l कहता है कनकरास मुझे तो बार-बार इस रूट पर गाड़ी चलाना है चाहे अच्छा हो या बुरा l हाँ, एक बात मैंने सीख ली है कि अब रात को गाड़ी नहीं चलाऊंगा l

इस हादसे से जहां एक ओर हाईवे चालक के असहाय अवस्था को सामने लाती है वहीं दूसरी ओर इस बात को खुलकर दर्शाती है कि हमारे हाईवे में कैसा जंगल राज चल रहा है l आधुनिक गाड़ियां अच्छे-अच्छे हाईवे के साथ-साथ चालकों की सुरक्षा और सुविधाओं पर भी ध्यान देना होगा l हर एक चालक कनकदास नहीं हो सकता है l हाईवे की ऐसी विपरीत परिस्थितियों को देखकर आने वाली पीढ़ी कभी किस्सा-ए- कनकरास यह न चाहेगी कि इस पेशे में आया जाए और वह दिन दूर नहीं जबकि ड्राइवरों के अभाव में गाड़ियां खिलौनों की तरह खड़ी रह जाएंगी


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